जैसा की हमने इसके पहले वाले पोस्ट में समझा था की यूरोपियन कम्पनिस का भारत में आगमन किस तरह से हुआ था और फिर उन्होंने धीरे धीरे अपने व्यापर को कैसे आगे बढ़ाया। एक के बाद एक यूरोपी कंपनी आयी और एक दूसरे का व्यापर को ख़त्म करके अपने साम्राज्य को बढ़ाने की कोशिश करने लगी। अंगेजो की हुकूमत बढ़ती गयी और धीरे धीरे उन्होंने भारत को जितने लगे। आज हम कुछ युद्धों को जानेंगे की अंगेजो ने किस किस के साथ युद्ध किया। 

कर्नाटक का युद्ध 


कर्णाटक का युद्ध : 

कर्नाटक का युद्ध अंग्रेजो और फ़्रांसिसीयो के मध्य व्यापर को लेकर हुआ। इनके बिच तीन युद्ध हुए ,जिन्हे हम कर्णाटक के युद्ध के नाम से जानते है। ये दोनों कंपनी यूरोपीय थी इन्हे वहा भी संघर्ष होते रहते थे। भारत में इनके 3 युद्ध हुए 1746 -1763  के मध्य तक चलते रहे। इसके परिणाम स्वरूप फ़्रांसिसीयो का भारत से सफाया हो गया और ब्रिटिश सरकार की विजय हुई। 

प्रथम कर्णाटक युद्ध (1746-1748):

अंग्रेजो के मुख्य कार्यालय थे मद्रास ,बॉम्बे ,कलकत्ता ,यही से इनका संचालन किया जाता था। उसी प्रकार फ़्रांसिसीयो का मुख्यालय पोंडिचरी  में था। इनका प्रथम युद्ध 1746 में प्रारम्भ हुआ ,इस समय डूप्ले फ़्रांसिसीयो का गवर्नर था। इस युद्ध में फ़्रांसिसीयो की जीत हुई और इन्होने मद्रास को जित लिया। "सेंट  टोमे का युद्ध " प्रथम कर्णाटक युद्ध के दौरान लड़ा गया एक यादगार युद्ध है। प्रथम कर्णाटक युद्ध एक्स ला शापेल की संधि से समाप्त हुआ .

भारत में  यूरोपीय शक्ति का आगमन 


द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749 -1754 ):

डूप्ले ने प्रथम कर्णाटक युद्ध में अपनी श्रेष्ठा को साबित करके उसके मन की जिज्ञाषा और बढ़ गयी और उसने भारतीय राजनीती में भाग लेकर अंग्रेजी हुकूमती को भारत से बिलकुल ख़त्म करने की रणनीति बनाने लगा। उसे इसका मौका हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकारी के विवाद में मिला। अंग्रेजो से लड़ने  के बदले  उसने   हैदराबाद के  मुजफ्फरजंग और कर्नाटक के चंदा साहेब का सहयोग किया।   इसके  बदले में  न चाहते हुए भी इन दोनों के खिलाफ अंग्रेजो ने नासिर जंग और अनवरुद्दीन का सहयोग किया। लेकिन 1749 में फ़्रांसिसी  सेना ने अनवरुद्दीन को मर दिया और कर्नाटक का अगला शासक चंदा साहिब को बना दिया। 1750 में नासिर जंग भी फ़्रांसिसी सेना के संघर्ष में मारा गया और हैदराबाद का नवाब मुजफ्फरगंज को बना दिया गया। इस  समय डूप्ले की शक्ति बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी। लेकिन दुर्भाग्य वश अनवरुद्दीन का पुत्र मुहम्मद अली युद्ध से बचके भाग गया और त्रिचनापल्ली में शरण ली। 
1752 में लोरेंश के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने त्रिचनापल्ली को बचा लिया और फ़्रांसिसी  आत्मा समर्पण करना पड़ा। इस हानि से   फ़्रांसिसी अधिकारियो ने डूप्ले को इसका जिम्मेदार ठहराया और उसे वापिस फ्रांस बुला लिया। इसके बाद दोनों कंपनी के बिच  वापिस संधि   हो गयी। डूप्ले के बाद फ़्रांसिसी गवर्नर बना गोडाहु। 

तृतीया कर्नाटक युद्ध (1756 -1763 ): 

ऐसे सप्तवर्षीय युद्ध के नाम से भी जाना जाता है क्युकी ये 1756 से 1763  तक 7 वर्षो तक चला  अंत में अंग्रेजी सेना की विजय हुयी। तृतीया कर्नाटक युद्ध के दौरान वांदीवाश का युद्ध   1760 में हुआ जिसमे फ़्रांसिसी अंग्रेजो से  अंतिम रूप से पराजित हुए। इसके बाद अंग्रेजो को  सिर्फ भारतीय राजाओ से युद्ध करना रहा और एक एक करके वो अपना अधिकार करते गए।